सटोरिये, ज्योतिषी या सर्वेक्षण: सच किसके पास है, यक़ीन किस पर करें




एक चुनावी जिज्ञासु की गीता गुरु कृष्ण को खुली चिट्ठी

हे गोपाल !
माया बंधनों और तमाम किस्म की विकट स्थितियों में उलझा मैं बहुत दुखी मन से तुम्हें पत्र लिख रहा हूं. समस्याएं इतनी विकट हैं कि अर्जुन होते तो भ्रमित हो जाते, गांडीव छोड़ देते, रथ से विरथ हो जाते. कुरुक्षेत्र छोड़ कर चले जाते.

इसे भाग्य समझूं या दुर्भाग्य कि मैं कुरुक्षेत्र नहीं छोड़ सकता. लड़ूं या न लड़ूं, रहना यहीं है और सब कुछ अपनी आंखों से होते देखना है.

हे परम पिता ! मैं ‘मतकाल’ में हूं और हर पांच साल में उसमें पड़ जाता हूं. कई बार सोचता हूं कि ऐसा क्यों हो रहा है मेरे साथ. सोचता हूं कि नेहरू को दोष दूं, फिर रुक जाता हूं. तुम्हीं बताओ कि नेहरू लोकतंत्र न थोप गए होते तो मैं उससे क्यों जूझता?

अपने सवालों का जवाब ढूंढने के लिए गीता पलटता हूं तो और उलझ जाता हूं. तुम परमात्मा हो, तुमने ठीक कहा होगा, पर इस चराचर जगत के प्राणी तुम्हारी गूढ़ और रहस्यमय बात समझ नहीं पाते. इसलिए आग्रह है कि अगली बार आसान शब्दों में, और हो सके तो नई वाली हिंदी में अपनी बात कहो.

हे राधावल्लभ! गीता के दसवें अध्याय में तुम कह गए हो कि “अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवार्षीणां च नारदः” और लोग आज तक उसका सही अर्थ नहीं समझ पाए.

तुमने कह दिया कि वृक्षों में मैं पीपल हूं और देवर्षियों, विद्वानों में नारद, लेकिन मैं चुनावकाल में इसे किस तरह समझूं. यही हाल दूसरे लोगों का भी है. सब अपने ढंग से अर्थ निकालते हैं और अनर्थ हो जाता है. इससे भ्रम पैदा होता है.

जो अर्थ निकाले जा रहे हैं उनसे तीन तरह की स्थितियां बनती हैं- हास्यापद, भयावह, सटीक. हालांकि तुम कह गए हो कि फल की चिंता मत करो, लेकिन कोई तुम्हारी बात नहीं मानता. सब फलाफल में लगे हैं.

भला हो महाकवि स्वामीनाथ का कि “अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां” का थोड़ा अर्थ खुला, वरना पता नहीं क्या होता. महाकवि ने लिखा “हरहरात पीपर सौं पार्लियामेंट पुरातन” तो समझ आया कि तुम वृक्षों में पीपल हो और वो पीपल पार्लियामेंट है. यानी तुम मूर्त रूप से पार्लियामेंट हो.

शायद इसीलिए संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते होंगे. जब तुम साक्षात वहां विराजते हो, तो वह मंदिर ही होगा.

तमाम नासमझ लोगों के आने-जाने के बाद किसी ने पहली बार मत्था टेक कर मंदिर में प्रवेश किया, तो लगा कि गीता का सार अब तक किसी ने समझा नहीं था.

मंदिर है, तो भक्त भी होंगे,
और हैं. मंहत होगा, और है. समस्या ये है कि महंत, परमपिता के चरण छोड़ कर हटना नहीं चाहता और भक्त इस पर गदगद हैं. मानते हैं कि ऐसा विद्वान, ज़हीन और महीन व्यक्ति इससे पहले मंदिर में आया ही नहीं.

हे कुंजविहारी! इस समय चुनाव में इतनी धूल उड़ रही है कि साफ कुछ दिखाई नहीं देता. पक्ष-विपक्ष पता नहीं चलता. जो इधर है, वही उधर दिखने लगता है. अगर पहले चला नहीं गया तो जाने वाला है. ऐसे में तुच्छ प्राणी क्या करे?

इतना ही होता तो गनीमत होती. कुछ प्राणी हैं जो शंख बजा-बजा कर 'अश्वत्थामा हतो' जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं. मतलब ये कि अगर कुछ साफ साफ है भी तो दिखाई-सुनाई न दे. जो सुनाई पड़े वो भी सत्य के सर्वथा विपरीत हो.

हे द्वारकाधीश! मैं ऐसे तीन तरह के प्राणियों से घिरा हुआ हूं. ज्योतिषी, सटोरिए और सर्वेक्षणकर्ता. इनमें से दो किस्म के प्राणी तुम्हारे लिए नए होंगे, पर तुम त्रिकालदर्शी हो, समझ जाओगे. इस तीनों ने जीवन इतना जटिल बना दिया है कि क्या कहूं.

ज्योतिषियों की मानूं तो लगता है नतीजे आ चुके हैं, सब कुछ हो चुका है. चुनावी धूल बैठ गई है. बस इतना बाकी है कि जो गद्दीनशीन है, वही गद्दीनशीन हो जाए.

प्लस-माइनस पांच परसेंट की गुंजाइश सभी रखते हैं, सो उन्होंने भी रख ली कि सीटों में ऊंच नीच हो सकती है, लेकिन नतीजा वही रहेगा. शनि वक्री होने वाला है, राहु केतु और वृहस्पति ने अपने घर बदल लिए हैं, लेकिन गद्दीनशीन नहीं बदलेगा.

हे गोपाल! तुम्हीं बताओ कि जब सब तय है, हो चुका है तो चुनाव की जरूरत क्या है. बेमतलब तमाम अक्षौहिणी सेनाएं क्यों कटें-मरें.

ऐसे लोग कम नहीं हैं जो मानते हैं कि ज्योतिषियों की बातें हवा हवाई हैं. अगर उनका ज्ञान और भविष्यदर्शन की शक्ति इतनी ही होती तो चंद भौतिक सुखों के लिए वे स्टूडियो क्यों भागते?

स्वयं गद्दीनशीन न होते तो किसी ऐसे को बिठा दिया होता जो वही करता, जो वे चाहते. हे देव! तुम्हें इन ज्योतिषियों पर क्रोध क्यों नहीं आता? तुम जानते हो कि दुनिया वे नहीं चला रहे हैं तो कुछ करते क्यों नहीं. कम से कम उनका प्रलाप ही रोक दो.

भ्रम फैलाने वालों में दूसरे नंबर पर सटोरिए और बाज़ार हैं. समझदार व्यापारी और कारोबारी बिना मतलब नहीं बोलता. अक्सर चुप रहता है. तराजू लेकर बैठता है, जिसके एक पलड़े पर संसद होती है और दूसरे पर सेंसेक्स.

सेंसेक्स जितना ऊपर जाता है, संसद उतना भारी हो जाती है. ये तुम्हारा ही सिद्धांत है– “उर्ध्वमूलम” तुमने ही कहा था– यानी उल्टा खड़ा पेड़, जिसकी जड़ें ऊपर हैं, तना नीचे.

संसद अपनी शाखा-प्रशाखा सहित जमीन के नीचे है और जड़ सेंसेक्स ऊपर. जड़ें निरंतर ऊपर जा रही हैं, इसलिए कारोबारी खुश हैं. उनके हिसाब से लोकतंत्र को असली मजबूती वही प्रदान कर रहे हैं.

बाकी लोगों की सिरफुटौव्वल का कोई अर्थ नहीं है. वे लहलहाती-लहराती जड़ें देख रहे हैं. जो नहीं देख पा रहे हैं, मिट्टी खोद रहे हैं. खाद पानी चाहे जितना डालें, वृक्ष को मिलता नहीं, क्योंकि जड़ें हवा में हैं.

लोग लाख कहें कि महंगाई है, कीमतें आसमान छू रही हैं, लोग कर्ज में हैं, नौकरियां नहीं हैं, व्यापार चौपट हो गया है, पर सेंसेक्स को इससे क्या मतलब. वो तो आसमान में है.

हे सर्वेश्वर! भ्रम पैदा करने वालों में तीसरे नंबर पर चुनावी सर्वेक्षण है. तुम्हारे जमाने में भी ऐसा था. पर उसका रूप संस्थागत नहीं था. इक्का-दुक्का लोग होते थे पर अब तो पूरी फौज है.

ये फौज अजीब है. उसके हथियार अलग हैं. वो जमीन पर नहीं लड़तीं, दिमाग में आभासी लड़ाई लड़ती है. ताकि जब तक फैसले का दिन आए, सबका दिमाग घूम जाए.

तुम्हें पता है कि सब माया है. सर्वेक्षण भी माया है. ऐसा बार- बार साबित हुआ है, लेकिन भ्रम बना रहता है. वे इतने तामझाम के साथ बात रखते हैं कि सत्य असत्य की रेखा मिट जाती है. यही वे चाहते हैं. बार-बार पलड़ा बदलते हैं और अंत में ऐसा भ्रम जाल बनता है कि लोग अष्टावक्र को सुदर्शन मानने लगते हैं.

मैं अपनी क्या कहूं सुदर्शनधारी! मतिभ्रम का शिकार हूं. सब जानते हुए कि सच क्या है, कल्याणकारी क्या है, लोकहित कहां है, भविष्य किस तरफ सुरक्षित है, मैं सब सुनने को विवश हूं. तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं? मताधिकार के सही इस्तेमाल की बात मत कहना प्रभु. उससे बात बनती नहीं. कुछ का कुछ हो जाता है.

हे द्वारकाधीश! जानता हूं कि तुम मेरे पत्र का जवाब नहीं दोगे. तुमने तो गोपियों को भी निराश किया था. मुझे करोगे तो हैरानी नहीं होगी.

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